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केन उपनिषद् Hindi Edition

By Sri Sri Ravi Shankar Hindi

गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर द्वत्र्रत्र् व्यत्र्ख्त्र्यत्र्न
उपनिषद् का है समीप आकर बैठना
या समीप आजा व्यक्तिगत मन का
सार्वभौमिक मन के समीप आना,
सीमित का असीमित के समीप आजा। सीमित
मन का असीमित को या अज्ञात का ज्ञात
को जानने की चेष्टा करना। उपनिषद
समीप आकर बैठना। लगभग 1100 उपनिषद
पाये जाते है। जिनमें से व्यारह
उपनिषाद सबसे प्रमुख और महत्वपूर्ण है।
यह शिष्य और गुरु के बीच का
वार्तालाप है जो हजारों वर्षों पहले संपन्न हुआ।
यह भी कहा जा सकता है कि इसमें
शिष्य अपने शुरू के समीप रह कर उससे
क्रमशः ज्ञान प्राप्त करता है क्योंकि शुरू
ज्ञान का मुहूर्त है। यह विश्व जो इतनी
विविधताओं से भरा पड़ा है। जहाँ अस्तित्व,
आपसी समझ, मतभेद और
विरोधाभास के कितने स्तर है इसमें कैसे
कोई किसी के समीप आ सकता है?
ऐसा कैसे के लिए, निश्चय ही कुशलता चाहिए।

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